प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को भारत के दो सबसे महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक अभियानों—चंद्रयान-4 और वीनस ऑर्बिटर मिशन (VOM)—को औपचारिक वित्तीय और प्रशासनिक मंजूरी प्रदान की। इस निर्णय से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का दायरा उपग्रह प्रक्षेपण से आगे बढ़कर जटिल ग्रहीय अन्वेषण और नमूना वापसी तक विस्तृत हो गया है।
स्वीकृत योजना के तहत चंद्रयान-4 मिशन के लिए ₹2,104.06 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जिसे 2028 तक प्रक्षेपित करने का लक्ष्य है। चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक लैंडिंग के बाद यह अभियान चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के करीब से नमूने एकत्र करने, स्वायत्त डॉकिंग करने और उन्हें पृथ्वी पर सुरक्षित वापस लाने का तकनीकी प्रदर्शन करेगा।
चंद्र नमूनों की सुरक्षित वापसी के लिए बहु-मॉड्यूल तकनीक
चंद्रयान-4 की वास्तुकला में पांच अलग-अलग मॉड्यूल शामिल होंगे जिन्हें एलवीएम-3 रॉकेट के जरिए दो अलग-अलग प्रक्षेपणों में भेजा जाएगा। प्रोपल्शन और लैंडर मॉड्यूल चंद्रमा पर उतरकर सतह की खुदाई करेंगे, जबकि असेंडर मॉड्यूल नमूनों को लेकर चंद्र कक्षा में ट्रांसफर मॉड्यूल से जुड़ेगा और पृथ्वी की ओर रवाना होगा।
इसके साथ ही मंत्रिमंडल ने ₹1,236 करोड़ के परिव्यय के साथ वीनस ऑर्बिटर मिशन (शुक्रयान) को मंजूरी दी। मार्च 2028 में प्रक्षेपित होने वाला यह उपग्रह शुक्र ग्रह के घने कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल, बादलों की रासायनिक संरचना, ज्वालामुखी गतिविधियों और सौर पवनों के प्रभावों का गहन विश्लेषण करेगा।
“ये ऐतिहासिक स्वीकृतियां भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक युगांतरकारी मोड़ हैं, जो ग्रहीय विज्ञान और भविष्य के मानव अभियानों के लिए नई संभावनाएं खोलती हैं।”
शुक्र ग्रह के अनसुलझे रहस्यों की खोज
मंत्रिमंडल ने गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम का विस्तार करते हुए 2028 तक 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' के पहले बेस मॉड्यूल (BAS-1) को स्थापित करने की समय-सीमा भी तय की। इसके लिए गगनयान का बजट बढ़ाकर ₹20,193 करोड़ किया गया है ताकि उन्नत डॉकिंग और लाइफ सपोर्ट सिस्टम की टेस्टिंग हो सके।
इन भारी पेलोड को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए सरकार ने ₹8,240 करोड़ की लागत से 'सूर्य' नामक नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) के विकास को मंजूरी दी। यह नया रॉकेट पृथ्वी की निचली कक्षा में 30 टन तक पेलोड ले जाने में सक्षम होगा, जिससे 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतारने का मार्ग प्रशस्त होगा।




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