न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा हॉल में विश्व नेताओं को संबोधित करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक 'समिट ऑफ द फ्यूचर' (भविष्य का शिखर सम्मेलन) में एक प्रभावशाली भाषण दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मानवता की सच्ची सफलता और प्रगति युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक शक्ति और सहयोग में निहित है।

वैश्विक राजनयिकों और राष्ट्राध्यक्षों के समक्ष अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) की प्राथमिकताओं और चिंताओं को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि जहां नई प्रौद्योगिकियां गरीबी उन्मूलन और सतत विकास में तेजी लाने की अपार क्षमता रखती हैं, वहीं उनके संचालन के लिए एक समावेशी और नैतिक वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता है।

नैतिक एआई शासन और वैश्विक लोक वस्तु के रूप में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर

प्रधानमंत्री के भाषण का मुख्य बिंदु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का मानव-केंद्रित नियमन रहा। मोदी ने प्रौद्योगिकी के हथियारीकरण और डिजिटल विभाजन के खतरों से आगाह करते हुए विश्व समुदाय से एक ऐसा संतुलित नियामक ढांचा तैयार करने का आग्रह किया जो राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करते हुए नवाचार को बढ़ावा दे।

डिजिटल गवर्नेंस में भारत की मिसाल पेश करते हुए मोदी ने देश के स्वदेशी डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI)—जिसमें आधार पहचान प्रणाली, यूपीआई (UPI) डिजिटल भुगतान और स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म शामिल हैं—को विकासशील देशों के साथ साझा करने की पेशकश की।

“प्रौद्योगिकी के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के लिए संतुलित विनियमन की आवश्यकता है। हम एक ऐसा वैश्विक डिजिटल शासन चाहते हैं जिसमें राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान हो और एआई मानव-केंद्रित बना रहे।”

21वीं सदी की वास्तविकताओं को दर्शाने के लिए बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार

वैश्विक शासन प्रणाली पर बोलते हुए मोदी ने पुरानी पड़ चुकी बहुपक्षीय संस्थाओं में तत्काल बदलाव की मांग की। उन्होंने कहा कि प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संस्थागत सुधार अनिवार्य है। 20वीं सदी के मध्य में बने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे निकायों में समकालीन वास्तविकताओं और ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व को जगह मिलनी चाहिए।

मोदी ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा 'पैक्ट फॉर द फ्यूचर' और 'ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट' को अपनाए जाने का स्वागत किया। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना ​​है कि इस संबोधन के जरिए भारत ने खुद को विकसित और विकासशील दुनिया के बीच एक भरोसेमंद पुल और वैश्विक समाधान प्रदाता के रूप में मजबूती से स्थापित किया है।

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