ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने 24 सितंबर, 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अपने पहले संबोधन में एक संतुलित और व्यावहारिक कूटनीतिक रुख अपनाया। उन्होंने घोषणा की कि यदि ईरान के खिलाफ लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को हटाया जाता है, तो इस्लामी गणराज्य 2015 के जेसीपीओए (JCPOA) परमाणु समझौते को फिर से सक्रिय करने के लिए वैश्विक शक्तियों के साथ रचनात्मक बातचीत के लिए पूरी तरह तैयार है।
ग्रीष्मकालीन चुनावों में सुधारवादी एजेंडे पर जीत हासिल करने के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहली उपस्थिति दर्ज कराते हुए, पूर्व हृदय रोग विशेषज्ञ पेज़ेशकियान ने पूर्ववर्ती कट्टरपंथी प्रशासन से अलग रुख प्रदर्शित करने की कोशिश की। उन्होंने वैश्विक समुदाय के साथ आर्थिक सामान्यीकरण और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया।
पश्चिमी शक्तियों के साथ संवाद और परमाणु समझौते की बहाली की तत्परता
पश्चिमी देशों को संबोधित करते हुए पेज़ेशकियान ने स्पष्ट किया कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार विकसित नहीं करना चाहता, जो सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के धार्मिक फतवे के तहत निषिद्ध है। हालांकि उन्होंने तर्क दिया कि विश्वास बहाली के लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों को ईरान की अर्थव्यवस्था को पंगु बना रहे आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्त करना होगा।
कूटनीतिक समाधान की बात करते हुए भी पेज़ेशकियान ने मध्य पूर्व में इजरायल के सैन्य अभियानों की तीखी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि इजरायली नेतृत्व लक्षित हत्याओं और हवाई हमलों के जरिए पूरे क्षेत्र को एक अनियंत्रित युद्ध में धकेलने की कोशिश कर रहा है।
“हम सभी के लिए शांति और सुरक्षा चाहते हैं, युद्ध नहीं। यदि जेसीपीओए के भागीदार देश अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाते हैं और अमानवीय प्रतिबंध समाप्त करते हैं, तो हम बातचीत के लिए तैयार हैं।”
क्षेत्रीय तनाव की निंदा और क्षेत्रीय सुरक्षा मंच का प्रस्ताव
पेज़ेशकियान ने फारस की खाड़ी की सुरक्षा विदेशी नौसैनिक हस्तक्षेप के बजाय तटीय देशों द्वारा सामूहिक रूप से सुनिश्चित करने की वकालत की। उन्होंने सऊदी अरब, इराक और अन्य खाड़ी देशों के साथ मिलकर एक क्षेत्रीय सुरक्षा मंच स्थापित करने का प्रस्ताव रखा।
यूरोपीय राजनयिकों ने पेज़ेशकियान के नरम रुख का सावधानीपूर्वक स्वागत किया है। उनका मानना है कि आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि क्या ईरान का नया प्रशासन घरेलू रूढ़िवादी शक्तियों के बीच इस कूटनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में सफल हो पाता है या नहीं।




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