ओस्लो स्थित नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने शुक्रवार को घोषणा की कि वर्ष 2024 का नोबेल शांति पुरस्कार जापानी संगठन 'निहोन हिदान्क्यो' को प्रदान किया गया है। यह संगठन 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमलों में जीवित बचे लोगों (हिबाकुशा) का एक जमीनी आंदोलन है।
वर्ष 1956 में स्थापित निहोन हिदान्क्यो ने परमाणु बम पीड़ितों की पीड़ा को दुनिया के सामने रखकर परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन के लिए लगभग सात दशकों तक अथक शांति अभियान चलाया है।
परमाणु विभीषिका के खिलाफ सात दशकों का नैतिक संघर्ष
अपने प्रत्यक्षदर्शी बयानों, शांति अभियानों और संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय शिष्टमंडलों के माध्यम से हिबाकुशा ने दुनिया भर में यह नैतिक चेतना पैदा की कि परमाणु हथियारों का उपयोग मानवता के खिलाफ असहनीय अपराध है।
नोबेल समिति ने चेतावनी दी कि वर्तमान में भू-राजनीतिक तनाव और परमाणु शक्तियों द्वारा हथियारों के आधुनिकीकरण के कारण परमाणु हथियारों के निषेध पर बना वैश्विक दायरा गंभीर खतरे में है।
“The Hibakusha help us to describe the indescribable, to think the unthinkable, and to grasp the incomprehensible pain and suffering caused by nuclear weapons.” — Jørgen Watne Frydnes, Chair of the Norwegian Nobel Committee
बढ़ते वैश्विक तनाव के बीच परमाणु निरस्त्रीकरण का संदेश
टोक्यो में इस घोषणा पर प्रतिक्रिया देते हुए संगठन के प्रतिनिधियों ने भावुक होकर कहा कि यह सम्मान उन अनगिनत हिबाकुशा साथियों को समर्पित है जो दुनिया को परमाणु मुक्त देखे बिना ही इस दुनिया से चले गए।
इस शांति पुरस्कार के तहत 1.1 करोड़ स्वीडिश क्रोनर प्रदान किए जाएंगे, और यह सम्मान 10 दिसंबर को ओस्लो में एक भव्य समारोह में निहोन हिदान्क्यो के प्रतिनिधियों को औपचारिक रूप से सौंपा जाएगा।
Frequently Asked Questions
निहोन हिदान्क्यो क्या है और यह किसका प्रतिनिधित्व करता है?
यह हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु बम हमलों में जीवित बचे लोगों (हिबाकुशा) का जापानी जमीनी संगठन है, जिसकी स्थापना 1956 में हुई थी।
निहोन हिदान्क्यो को नोबेल शांति पुरस्कार क्यों दिया गया?
नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने परमाणु हथियारों के पूर्ण खात्मे और प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्यों के जरिए शांति स्थापित करने के सात दशक के प्रयासों के लिए इसे सम्मानित किया।





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