जापान की सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) के अध्यक्ष पद की दौड़ 23 सितंबर, 2026 को अपने चरम पर पहुंच गई, जब पूर्व रक्षा मंत्री शिगेरु इशिबा, आर्थिक सुरक्षा मंत्री साने ताकाइची और पूर्व पर्यावरण मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी टोक्यो में अंतिम टेलीविजन बहस में आमने-सामने आए। प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के पद छोड़ने के बाद, 27 सितंबर को होने वाले चुनाव का विजेता संसद में गठबंधन के बहुमत के कारण जापान का अगला प्रधानमंत्री बनेगा।

उम्मीदवारों के बीच आर्थिक नीति और मौद्रिक सामान्यीकरण मुख्य टकराव का मुद्दा रहा। बैंक ऑफ जापान द्वारा वर्षों की अति-सुलभ मौद्रिक नीति को समाप्त किए जाने के बीच, ब्याज दरों में वृद्धि, मुद्रास्फीति और कमजोर येन से निपटने को लेकर उम्मीदवारों के विचारों में स्पष्ट भिन्नता दिखाई दी।

आर्थिक दर्शन में मतभेद: आबेनोमिक्स बनाम राजकोषीय अनुशासन

दिवंगत प्रधानमंत्री शिंजो आबे की समर्थक साने ताकाइची ने ब्याज दरों में आक्रामक वृद्धि पर सवाल उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि समय से पहले दरें बढ़ाने से निजी निवेश और उपभोग को नुकसान पहुंचेगा। इसके विपरीत ताकाइची ने सामरिक राजकोषीय प्रोत्साहन का प्रस्ताव रखा, जिसमें क्वांटम कंप्यूटिंग और रक्षा तकनीक में भारी निवेश शामिल है।

इसके विपरीत शिगेरु इशिबा ने राजकोषीय अनुशासन और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर बल दिया। उन्होंने आयातित महंगाई से निपटने के लिए बैंक ऑफ जापान की मौद्रिक सामान्यीकरण प्रक्रिया का समर्थन किया। इशिबा ने टोक्यो से सरकारी एजेंसियों को बाहर स्थानांतरित करने और एक समर्पित आपदा प्रबंधन एजेंसी बनाने का वादा किया।

“हमें पूर्ण पारदर्शिता के माध्यम से राजनीति में जनता का विश्वास बहाल करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारा आर्थिक पुनरुद्धार उन ग्रामीण समुदायों तक पहुंचे जो दशकों से उपेक्षित रहे हैं।”

राजनीतिक विश्वास, रक्षा आधुनिकीकरण और प्रधानमंत्री पद की दौड़

जापान के सबसे युवा प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में शामिल शिंजिरो कोइज़ुमी ने पीढ़ीगत बदलाव और सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया। कोइज़ुमी ने अपने पहले वर्ष में श्रम बाजार के नियमों को उदार बनाने और राजनीतिक चंदे में पूर्ण पारदर्शिता लाने का संकल्प लिया ताकि पार्टी के हालिया फंड विवादों से पार पाया जा सके।

संसद के 367 सांसदों और स्थानीय पार्टी सदस्यों के 367 मतों के साथ मुकाबला बेहद कड़ा है। विश्लेषकों का मानना है कि पहले दौर में किसी को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में शीर्ष दो उम्मीदवारों के बीच रन-ऑफ मुकाबला होगा, जो आने वाले आम चुनाव से पहले देश का भविष्य तय करेगा।

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