भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने मंगलवार को घोषणा की कि उसने गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन के लिए अपने स्वदेशी CE20 क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन के ह्यूमन-रेटिंग योग्यता परीक्षणों को सफलतापूर्वक संपन्न कर लिया है। तमिलनाडु के महेंद्रगिरि स्थित इसरो प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स (IPRC) में आयोजित इन परीक्षणों ने लिक्विड ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन इंजन को अंतरिक्ष यात्रियों को कक्षा में ले जाने के लिए अधिकृत कर दिया है।

ह्यूमन-रेटिंग किसी भी रॉकेट प्रणाली के लिए वैश्विक एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का सर्वोच्च सुरक्षा मानक होता है। इंसानों को अंतरिक्ष में ले जाने वाले रॉकेटों के लिए सामान्य उपग्रह प्रक्षेपण की तुलना में कहीं अधिक सख्त सुरक्षा और विश्वसनीयता मार्जिन की जरूरत होती है। इसरो के परीक्षण कार्यक्रम में इंजन को 21.8 टन तक के थ्रस्ट और अत्यधिक दवाब वाली परिस्थितियों में परखा गया।

कठोर सुरक्षा मानक और तरल प्रणोदन प्रौद्योगिकी में दक्षता

इन परीक्षणों के दौरान CE20 इंजन ने कुल 8,810 सेकंड से अधिक समय तक लगातार जलने की क्षमता का प्रदर्शन किया, जो वास्तविक उड़ान में आवश्यक 635 सेकंड के लक्ष्य से कई गुना अधिक है। इंजन ने शून्य वायुमंडलीय दबाव और चरम परिस्थितियों में भी असाधारण संरचनात्मक स्थिरता और ईंधन नियंत्रण साबित किया।

CE20 इंजन भारत के सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM3 (लॉन्च व्हीकल मार्क-3) के तीसरे यानी C25 क्रायोजेनिक ऊपरी चरण को शक्ति प्रदान करता है। यह चरण अंतरिक्ष यात्रियों वाले 5.3 टन वजनी गगनयान मॉड्यूल को पृथ्वी की 400 किलोमीटर ऊंची निचली कक्षा में स्थापित करने के लिए आवश्यक अंतिम गति प्रदान करता है।

“CE20 इंजन का सफल मानव-रेटिंग परीक्षण गगनयान के लिए एक विशाल छलांग है। यह अंतरिक्ष में हमारे साहसी यात्रियों की सुरक्षा के लिए उच्चतम प्रणोदन विश्वसनीयता प्रदान करता है।”

भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन की दिशा में ऐतिहासिक कदम

इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ ने लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम सेंटर (LPSC) और IPRC के वैज्ञानिकों की सराहना करते हुए कहा कि स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक में यह महारत भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में मजबूती से खड़ा करती है जिनके पास अपनी मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता है।

इस महत्वपूर्ण मंजूरी के बाद इसरो अब मानवरहित परीक्षण उड़ानों (G1 और G2) की तैयारी में जुटा है, जिसमें 'व्योममित्र' रोबोट को अंतरिक्ष में भेजकर वायुमंडलीय पुन: प्रवेश, पर्यावरण नियंत्रण और पैराशूट प्रणालियों का वास्तविक परीक्षण किया जाएगा।

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