मुंबई के दलाल स्ट्रीट पर भारतीय इक्विटी बाजारों ने तेजी का नया इतिहास रच दिया। वैश्विक स्तर पर नकदी के तेज प्रवाह के बीच 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 84,900 अंक के पार निकलकर 84,980.53 के नए सर्वकालिक उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 50 इंडेक्स भी 25,950 के पार निकलकर ऐतिहासिक 26,000 के आंकड़े के दरवाजे पर दस्तक देने लगा।

भारतीय बाजारों में इस तूफानी तेजी को अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में 50 आधार अंकों की कटौती से बल मिला। विकसित देशों में मौद्रिक नीतियों में ढील के बाद विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था यानी भारत में अपना आवंटन तेजी से बढ़ाया है।

वैश्विक जोखिम क्षमता में वृद्धि और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की वापसी

बाजार में चौतरफा खरीदारी देखी गई। प्रमुख निजी बैंकों—एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक—ने बाजार को सबसे ज्यादा सहारा दिया। बेहतर मानसूनी बारिश के बाद आगामी त्योहारी सीजन में ग्रामीण और शहरी मांग में उछाल की उम्मीद से महिंद्रा एंड महिंद्रा और मारुति सुजुकी जैसे ऑटो शेयरों में भी जोरदार तेजी रही।

दूरसंचार दिग्गज भारती एयरटेल और रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भी सूचकांक को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। बीएसई पर सूचीबद्ध सभी कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण नए ऐतिहासिक रिकॉर्ड पर पहुंच गया, जिसने दुनिया के पांचवें सबसे बड़े इक्विटी बाजार के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत किया।

“भारतीय बाजार अभूतपूर्व मजबूती का प्रदर्शन कर रहा है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा दर कटौती चक्र शुरू करने से वैश्विक स्तर पर जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है, और भारत की आर्थिक स्थिरता विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर रही है।”

मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था और खुदरा निवेशकों की मासिक एसआईपी का सहारा

इस ऐतिहासिक तेजी की सबसे बड़ी ताकत भारत के घरेलू खुदरा निवेशकों का अटूट भरोसा है। म्यूचुअल फंड्स में घरेलू खुदरा निवेशकों का मासिक व्यवस्थित निवेश योजना (SIP) प्रवाह हाल ही में ₹23,500 करोड़ के पार पहुंच गया, जिससे विदेशी बिकवाली के किसी भी जोखिम से बाजार सुरक्षित बना हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों द्वारा भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.0% से 7.2% रहने के अनुमान और खुदरा मुद्रास्फीति के आरबीआई के 4% के लक्ष्य के दायरे में बने रहने से अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मजबूत कॉरपोरेट कमाई आने वाले समय में भी बाजार के प्रीमियम मूल्यांकन को सही ठहराएगी।

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