अमेरिका स्थित नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर (NSIDC) के वैज्ञानिकों ने मंगलवार को घोषणा की कि अंटार्कटिका की समुद्री बर्फ इस सर्दी में 19 सितंबर को अपने चरम पर पहुंची, जो मात्र 1.716 करोड़ वर्ग किलोमीटर (66.3 लाख वर्ग मील) मापी गई। उपग्रह निगरानी के 46 वर्षों के इतिहास में यह अब तक का दूसरा सबसे कम शीतकालीन विस्तार है।

कोलोराडो विश्वविद्यालय बोल्डर से संचालित इस संस्थान और नासा के उपग्रह आंकड़ों से स्पष्ट हुआ कि यह विस्तार केवल सितंबर 2023 में दर्ज 1.696 करोड़ वर्ग किलोमीटर के सर्वकालिक न्यूनतम स्तर से थोड़ा सा अधिक है। 1981 से 2010 के दीर्घकालिक औसत की तुलना में इस वर्ष बर्फ का आवरण 15.5 लाख वर्ग किलोमीटर कम रहा—जो अलास्का के क्षेत्रफल से भी बड़ा भूभाग है।

उपग्रह आंकड़ों ने की दक्षिणी महासागर में बर्फ की कमी की पुष्टि

1979 में उपग्रह ट्रैकिंग शुरू होने के बाद दशकों तक अंटार्कटिक समुद्री बर्फ में स्थिरता और मामूली वृद्धि देखी गई थी, जिसने 2014 में 2.014 करोड़ वर्ग किलोमीटर का सर्वकालिक उच्च स्तर छुआ था। लेकिन 2016 के बाद यह रुझान अचानक पलट गया और लगातार रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की जा रही है।

ध्रुवीय समुद्र विज्ञानियों का कहना है कि यह गिरावट सामान्य मौसमी बदलाव नहीं है। दक्षिणी महासागर में तैरते अर्गो फ्लोट्स (Argo floats) से मिले आंकड़े बताते हैं कि समुद्र की ऊपरी सतह में अत्यधिक गर्मी जमा हो रही है, जिससे नीचे से उठने वाला गर्म पानी बर्फ को जमने नहीं दे रहा है।

“यद्यपि वार्षिक स्तर पर थोड़ा उतार-चढ़ाव रहता है, लेकिन 2023 के बाद से लगातार बर्फ की कमी दक्षिणी महासागर में एक स्थायी संरचनात्मक बदलाव की ओर इशारा करती है। महासागर काफी गर्म हो चुका है।”

महासागर के गर्म जल से ध्रुवीय जलवायु प्रणाली में स्थायी बदलाव

समुद्री बर्फ की यह कमी केवल ध्रुवीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे वैश्विक पर्यावरण पर पड़ता है। समुद्री बर्फ सफेद होने के कारण सूर्य की किरणों को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देती है। बर्फ पिघलने से खुला गहरा समुद्री जल सौर ऊर्जा को सोखता है, जिससे वैश्विक तापमान तेजी से बढ़ता है।

इसके अतिरिक्त, समुद्री बर्फ तटीय बर्फ की चट्टानों (Ice Shelves) को तेज तूफानी लहरों से बचाने वाले एक प्राकृतिक कवच का काम करती है। बर्फ की ढाल पतली होने से तटीय ग्लेशियरों के ढहने का खतरा बढ़ जाता है, जिसका दीर्घकाल में समुद्र के जलस्तर में वृद्धि पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

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