यूरोपीय संघ के न्यायालय (सीजेईयू) ने मानवाधिकारों की रक्षा में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि अफगानिस्तान में तालिबान शासन द्वारा महिलाओं और लड़कियों पर थोपी गई पाबंदियां यूरोपीय कानून के तहत उत्पीड़न की श्रेणी में आती हैं।

लक्जमबर्ग स्थित अदालत ने दो अफगान महिलाओं (मामला C-608/22 और C-609/22) की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए फैसला दिया कि यूरोपीय संघ के सभी 27 सदस्य देशों को अफगान महिलाओं को केवल उनकी राष्ट्रीयता और लिंग के आधार पर शरण देनी होगी।

महिलाओं के अधिकारों के व्यवस्थित हनन को अदालत ने माना उत्पीड़न

अगस्त 2021 में सत्ता में लौटने के बाद से तालिबान ने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह अलग-थलग कर दिया है, जिसमें माध्यमिक शिक्षा और विश्वविद्यालय पर रोक, रोजगार पर पाबंदी और पुरुष संरक्षक के बिना यात्रा करने पर प्रतिबंध शामिल हैं।

यूरोपीय न्यायाधीशों ने माना कि भले ही कुछ पाबंदियां अलग-अलग देखने पर उत्पीड़न न लगें, लेकिन उनका संचयी प्रभाव महिलाओं को उनके बुनियादी मानवीय अधिकारों और सम्मान से पूरी तरह वंचित करता है।

“तालिबान शासन द्वारा महिलाओं के खिलाफ अपनाए गए भेदभावपूर्ण उपाय इतने गंभीर हैं कि वे उत्पीड़न के कृत्य हैं, जो व्यक्तिगत जोखिम साबित किए बिना शरणार्थी का दर्जा देने को उचित ठहराते हैं।” — यूरोपीय संघ का न्यायालय (सीजेईयू)

व्यक्तिगत प्रमाण की अनिवार्यता समाप्त, यूरोपीय शरण नियमों में बड़ा बदलाव

इस फैसले से अफगान महिला शरणार्थियों पर से वह कानूनी बोझ हट गया है जिसके तहत उन्हें यह साबित करना पड़ता था कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से तालिबान द्वारा निशाना बनाया जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) और मानवाधिकार संगठनों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे पूरे यूरोप में शरण नीतियों को मानवीय और पारदर्शी बनाने वाला कदम बताया है।

Frequently Asked Questions

यूरोपीय न्यायालय ने अफगान महिलाओं पर क्या फैसला सुनाया?

अदालत ने माना कि तालिबानी पाबंदियां उत्पीड़न हैं और अफगान महिलाओं को केवल लिंग और नागरिकता के आधार पर शरण मिलनी चाहिए।

क्या अब अफगान महिलाओं को व्यक्तिगत उत्पीड़न साबित करना होगा?

नहीं, अदालत ने स्पष्ट किया है कि अफगान नागरिक और महिला होना ही शरणार्थी का दर्जा प्राप्त करने के लिए कानूनी रूप से पर्याप्त है।

Sources