यूरोपीय संघ के न्यायालय (सीजेईयू) ने विश्व फुटबॉल की सर्वोच्च संस्था फीफा को बड़ा झटका देते हुए फैसला सुनाया कि फीफा के खिलाड़ी ट्रांसफर नियम यूरोपीय संघ के प्रतिस्पर्धा कानून और आवागमन की स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं।
लक्जमबर्ग स्थित शीर्ष अदालत ने पूर्व फ्रांसीसी मिडफील्डर लसाना डियारा से जुड़े मामले में यह ऐतिहासिक फैसला दिया। अदालत ने माना कि अनुबंध तोड़ने पर खिलाड़ियों और उनके नए क्लबों पर भारी जुर्माना लगाने वाले नियम अनुचित हैं।
खिलाड़ियों पर थोपी गई पाबंदियों और भारी जुर्माने को अदालत ने किया खारिज
फीफा के मौजूदा नियमों के तहत, बिना ठोस वजह के अनुबंध समाप्त करने वाले खिलाड़ियों पर भारी हर्जाना लगाया जाता था और नए क्लब को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए ट्रांसफर सर्टिफिकेट रोक दिया जाता था।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ये कड़े प्रावधान खिलाड़ियों को सीमा पार रोजगार खोजने से रोकते हैं और यूरोपीय एकल बाजार में क्लबों के बीच स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।
“विचाराधीन नियम ऐसे हैं जो पेशेवर फुटबॉलरों के नए क्लब में जाकर काम करने और अपनी प्रतिभा विकसित करने के मुक्त आवागमन में बाधा डालते हैं, जिससे भारी कानूनी और वित्तीय जोखिम पैदा होता है।” — यूरोपीय संघ का न्यायालय (सीजेईयू)
फुटबॉल ट्रांसफर बाजार के लिए 1995 के बोसमैन फैसले जैसा क्रांतिकारी क्षण
खिलाड़ियों के वैश्विक संघ फिफप्रो (FIFPRO) ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे खिलाड़ियों के अधिकारों की ऐतिहासिक जीत बताया और इसकी तुलना 1995 के ऐतिहासिक बोसमैन फैसले से की।
इस फैसले के बाद फीफा को अपनी पूरी ट्रांसफर प्रणाली और अनुशासनात्मक नियमों में व्यापक बदलाव करने होंगे, जिससे भविष्य में खिलाड़ियों को अनुबंध समाप्त करने पर अधिक कानूनी सुरक्षा मिल सकेगी।
Frequently Asked Questions
यूरोपीय न्यायालय ने फीफा के नियमों पर क्या फैसला सुनाया?
अदालत ने कहा कि फीफा के ट्रांसफर और अनुबंध समाप्ति से जुड़े नियम यूरोपीय संघ के प्रतिस्पर्धा कानून और मुक्त आवागमन के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।
इस फैसले की तुलना 1995 के बोसमैन मामले से क्यों की जा रही है?
क्योंकि यह फैसला भी खिलाड़ियों को क्लबों की मनमानी पाबंदियों से मुक्त कर उन्हें ट्रांसफर बाजार में अभूतपूर्व स्वतंत्रता और कानूनी अधिकार प्रदान करता है।





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